रविवार, 26 जून 2011

Gajani

भारत मे गजनी शब्द को सुनते ही एक आक्रान्ता की छवि उभरती है। महमूद गजनी एक दुर्दान्त आक्रमणकारी था जिसने 997 से 1028 के बीच सतरह बार भारत पर हमला किया। सोमनाथ मंदिर के विध्वंस भी इसने ही किया था। आज अफ़गानिस्तान के जिस सूबे को कंदहार कहते हैं, पौराणिक काल में भारत के पश्चिमोत्तर में स्थित यही क्षेत्र गांधार कहलाता था। गजनी का रिश्ता गांधार से ही है। आज कंदहार अलग प्रांत है और गजनी एक अलग प्रांत। गजनी के लोग ही गजनवी कहलाते हैं इसीलिए महमूद गजनी को महमूद गजनवी भी कहते हैं। यूं तो अफगानिस्तान पठान कौम की वजह से जाना जाता है मगर यहां कई अन्य कबाइली जातियां भी सैकड़ों सालों से निवास करती रही हैं जिनमें तुर्क, मंगोल, तातार आदि भी हैं। अफगानिस्तान के कंधार प्रान्त तक ईसापूर्व से ही तुर्क बसने लगे थे। कंधार के तुर्कों को गज़ तुर्क की पहचान मिली। अरबी हमलावरों ने अफगानिस्तान में भी इस्लाम का परचम फहराया। इससे पहलेगजतुर्क बौद्ध थे, शॉमन थे या ताओवादी भी थे। अधिकांश तुर्कों की अपनी कबीलाई धार्मिक आस्थाएं थीं। सातवीं सदी में जब अफगानिस्तान में इस्लाम ने कदम रखा तब वहां भी इस्लाम अपनाया गया और गज़ तुर्क भी मुसलमान हुए अन्यथा वहां बौद्धधर्म का बोलबाला था और गजनी पश्चिमी भारत का प्रमुख बौद्धकेन्द्र था। पश्चिमी दुनिया को पूर्वी दुनिया से जोड़नेवाले प्राचीन रेशम मार्ग यानी सिल्क रूट का भी एक प्रमुख मुकाम था गजनी। यहां वस्त्र उद्योग काफी बढ़ा चढ़ा था। रेशमी और सूती धागों के ताने-बाने से सेमीसिल्क कपड़ा बनाने की कला में यहां के कारीगर माहिर थे। इस कपड़े को भी गजनी नाम ही मिला था। महाराष्ट्र और गुजरात में कुछ दशक पहले तक यह शब्द जाना-पहचाना था। कृपा कुलकर्णी के मराठी व्युत्पत्ति कोश में इसका उल्लेख है।

Singh

सिं ह के सिंघ बनने का मामला सीधे सीधे ध्वनितंत्र से जुड़ रहा है। भाषाओं के संदर्भ में ध्वनितंत्र पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है। अलग अलग समूहों में उच्चारण भिन्नता होती है। हर समूह में परिनिष्ठित भाषा बोलनेवाले भी रहे हैं। मराठीभाषियों सहित अधिकांश पढ़ेलिखे दक्षिण भारतीय कभी सिंग, सिंघ नहीं उच्चारते। बड़ी सफ़ाई के साथ सिंह ही बोलते हैं और इसके लिए किसी श्रम की ज़रूरत नहीं पड़ती। मराठी लेखक अविनाश बिनीवाले ने अपनी पुस्तक ‘भाषा घड़तांना’ में ऐतिहासिक भाषावैज्ञनिक दृष्टि से सिंह के सिंघ में बदलने पर विचार रखे हैं। भाषायी अपकर्ष या उसके भ्रष्ट होने का सिलसिला भी बेहद पुराना है। भाषा भ्रष्ट न होती तो पाणिनी को ईसा पूर्व छठी सदी में तत्कालीन प्रचलित प्राकृतों के उच्चारण इतने न चुभे होते और उन्हें भाषा को संस्कारित करने और उसका व्याकरण रचने की ज़रूरत न पड़ती। उन्होंने खोज कर शब्दों के मूल स्वरूप निर्धारित किए और इस तरह संस्कारित भाषा संस्कृत कहलाई। बहरहाल, यह संदर्भ इसलिए क्योंकि सिंह का प्राकृत सिंघ रूप तब भी चलन में था। हमारे यहां संस्कृत उच्चारण की वैदिक परम्परा का बड़ा महत्व है। इस परम्परा की दो शैलियाँ भारत में प्रचलित हैं। एक ऋग्वैदीय और दूसरी यजुर्वेदीय। वेदों में पहला वेद ऋग्वेद है और इसी आधार पर इसकी ऋचाओं के पाठ की शैली को ऋग्वैदीय कहा गया। इस शैली में दीक्षित ब्राह्मण, पुरोहित और उद्गाता ऋग्वैदीय ब्राह्मण कहलाए