रविवार, 26 जून 2011

Singh

सिं ह के सिंघ बनने का मामला सीधे सीधे ध्वनितंत्र से जुड़ रहा है। भाषाओं के संदर्भ में ध्वनितंत्र पर ध्यान देना बहुत आवश्यक है। अलग अलग समूहों में उच्चारण भिन्नता होती है। हर समूह में परिनिष्ठित भाषा बोलनेवाले भी रहे हैं। मराठीभाषियों सहित अधिकांश पढ़ेलिखे दक्षिण भारतीय कभी सिंग, सिंघ नहीं उच्चारते। बड़ी सफ़ाई के साथ सिंह ही बोलते हैं और इसके लिए किसी श्रम की ज़रूरत नहीं पड़ती। मराठी लेखक अविनाश बिनीवाले ने अपनी पुस्तक ‘भाषा घड़तांना’ में ऐतिहासिक भाषावैज्ञनिक दृष्टि से सिंह के सिंघ में बदलने पर विचार रखे हैं। भाषायी अपकर्ष या उसके भ्रष्ट होने का सिलसिला भी बेहद पुराना है। भाषा भ्रष्ट न होती तो पाणिनी को ईसा पूर्व छठी सदी में तत्कालीन प्रचलित प्राकृतों के उच्चारण इतने न चुभे होते और उन्हें भाषा को संस्कारित करने और उसका व्याकरण रचने की ज़रूरत न पड़ती। उन्होंने खोज कर शब्दों के मूल स्वरूप निर्धारित किए और इस तरह संस्कारित भाषा संस्कृत कहलाई। बहरहाल, यह संदर्भ इसलिए क्योंकि सिंह का प्राकृत सिंघ रूप तब भी चलन में था। हमारे यहां संस्कृत उच्चारण की वैदिक परम्परा का बड़ा महत्व है। इस परम्परा की दो शैलियाँ भारत में प्रचलित हैं। एक ऋग्वैदीय और दूसरी यजुर्वेदीय। वेदों में पहला वेद ऋग्वेद है और इसी आधार पर इसकी ऋचाओं के पाठ की शैली को ऋग्वैदीय कहा गया। इस शैली में दीक्षित ब्राह्मण, पुरोहित और उद्गाता ऋग्वैदीय ब्राह्मण कहलाए

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